Wednesday, April 23, 2008

काश कभी होता ये मेरे इख्तिआर में..

काश कभी होता ये मेरे इख्तिआर में
मैं रंग देता सनम तुझे अपने प्यार में
मैं इतना प्यार देता तुझे जान-ए-आरजू
तू ख़ुद को भूल जाती मेरे ऐतबार में
तू जो कभी बुलाती मुलाक़ात के लिए
बेचैन हो के फिरती मेरे इंतिज़ार में
में देर से जो आता नाराज़ हो के
तुम हर बात का जवाब देती इनकार में
तू जो किसी बात पर मुझ से रूठ जाती
में तुझे मनाता बड़े इसरार में
मान कर तू मुझ से सिर्फ़ यही कहती
है यकीन नहीं कमी कोई तेरे प्यार में..

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