Tuesday, April 29, 2008

तेरे जिस्म की चाहत किसने की है..

यह शिकायत नही मेरे दिल की बात है,
जिसे भूल जाना है वो तुझे क्यों याद है,
तेरे जिस्म की चाहत किसने की है,

इतना काफी है कि तेरी रूह मेरे पास है,
इबादत बनाने से पहले ही मोहब्बत कहीं खो सी जाती है,

इश्क कि इस दुनिया में कितने बेबस हालत हैं,
रूह मेरी पाक बन गई है तेरे प्यार में,

इस जिस्म की अब क्या औकात है,
जो रुलाता है मेरे दिल को दर्द देके,

क्या बताऊं तुझे खुदा कितना मासूम वो इंसान है,
हाथ खाली है मेरे चाहे तो छू कर देख ले,

कहती है लकीरें हममे छुपा कोई तूफ़ान है,
थक चुका हूँ इश्क के दर्द से,

जबकि जनता हूँ अभी दर्द होना जवान है,
चाँदनी रातों में आंसू से अँधेरा गीला करना,

येही तो इश्क का बड़ा प्यारा अंदाज़ है,
कभी वक्त मिले तो मुझसे भी मोहब्बत करके देखना,

तेरी बेरूखियों को आज भी मेरा आदाब है !

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