कहते हैं इस गुनाह की होती कोई सज़ा नही..
आप को भूल जाएँ इतने तो बेवफा नही
आप से क्या गिला करे, आप से कुछ गिला नही
शीशा-ए-दिल को तोड़ना उनका खेल है
हमसे ही भूल हो गई उनकी कोई ख़ता नही
काश वो अपने गम मुझे दे दे तो कुछ सुकून मिले
वो कितना बदनसीब है गम जिसे मिला नही
करनी है अगर वफ़ा कैसे वफ़ा को छोड़ दू
कहते हैं इस गुनाह की होती कोई सज़ा नही..

1 Comments:
सज़ा हो तो भी क्या। शीशा ए दिल तो टूट ही गया।
Post a Comment
<< Home