Tuesday, April 29, 2008

इस दीवाने दिल को देखो क्या सेवा अपनाए है..

इस दीवाने दिल को देखो क्या सेवा अपनाए है,
उस पर ही विस्वाश करे है जिससे धोखा खाए है,
सारा कलेजा कट कट कर जब अश्को मै बह जाए है,
तब कोई फरहाद बना है तब मजनू कहलाये है ।
मैं भी फिरू हूँ मारा मारा छोड़ के उसके दामन को,
पेड़ का पत्ता टूट के जैसे आवारा हो जाए है,
मैं जो तड़प के रोऊ हो तो जालिम यूँ फरमाये है,
इतना गहरा जख्म कहाँ है नाहक शोर मचाये है ।

तेरा ये प्यार भी दरिया है उतर जायेगा..

वो तो खुशबू है हवाओं में बिखर जायेगा ,
मसला फूल का है फूल किधर जायेगा ।
हम तो समझे थे कि एक ज़ख्म है भर जायेगा ,
क्या ख़बर थी कि रग-ए-जान में उतर जायेगा ।
वो हवाओं की तरह खाना-बजां फिरता है ,
एक झोखा है जो आयेगा गुज़र जायेगा ।
वो जब आयेगा तो फिर उस की रफाकात के लिए ,
मौसम-ए-गुल मेरे आँगन में ठहर जायेगा ।
आखिरश वो भी कहीं रेत पे बैठी होगी ,
तेरा ये प्यार भी दरिया है उतर जायेगा ।

तेरे जिस्म की चाहत किसने की है..

यह शिकायत नही मेरे दिल की बात है,
जिसे भूल जाना है वो तुझे क्यों याद है,
तेरे जिस्म की चाहत किसने की है,

इतना काफी है कि तेरी रूह मेरे पास है,
इबादत बनाने से पहले ही मोहब्बत कहीं खो सी जाती है,

इश्क कि इस दुनिया में कितने बेबस हालत हैं,
रूह मेरी पाक बन गई है तेरे प्यार में,

इस जिस्म की अब क्या औकात है,
जो रुलाता है मेरे दिल को दर्द देके,

क्या बताऊं तुझे खुदा कितना मासूम वो इंसान है,
हाथ खाली है मेरे चाहे तो छू कर देख ले,

कहती है लकीरें हममे छुपा कोई तूफ़ान है,
थक चुका हूँ इश्क के दर्द से,

जबकि जनता हूँ अभी दर्द होना जवान है,
चाँदनी रातों में आंसू से अँधेरा गीला करना,

येही तो इश्क का बड़ा प्यारा अंदाज़ है,
कभी वक्त मिले तो मुझसे भी मोहब्बत करके देखना,

तेरी बेरूखियों को आज भी मेरा आदाब है !

Wednesday, April 23, 2008

कहते हैं इस गुनाह की होती कोई सज़ा नही..

आप को भूल जाएँ इतने तो बेवफा नही
आप से क्या गिला करे, आप से कुछ गिला नही
शीशा-ए-दिल को तोड़ना उनका खेल है
हमसे ही भूल हो गई उनकी कोई ख़ता नही
काश वो अपने गम मुझे दे दे तो कुछ सुकून मिले
वो कितना बदनसीब है गम जिसे मिला नही
करनी है अगर वफ़ा कैसे वफ़ा को छोड़ दू
कहते हैं इस गुनाह की होती कोई सज़ा नही..

मेरी तरह से उसे कोई चाहता भी हो..

अब तेरे मेरे बीच जरा फासला भी हो,
हम लोग जब मिलें तो कोई दूसरा भी हो,
तू जानता नही मेरी चाहत अजीब है,
मुझ को मना रहा है कभी ख़ुद खफा भी हो,
तू बेवफ़ा नही है मगर बेवफायी कर,
उस की नज़र में रहने का कुछ सिलसिला भी हो,
पतझड़ के टूटे हुए पत्तों के साथ साथ,
मौसम कभी तो बदलेगा यह आसरा भी हो,
चुप चाप उस को बैठ के देखूँ तमाम रात,
जागा हुआ भी हो कोई सोया हुआ भी हो,
उस के लिए तो मैने यहाँ तक दुआएं की,
मेरी तरह से उसे कोई चाहता भी हो..

काश कभी होता ये मेरे इख्तिआर में..

काश कभी होता ये मेरे इख्तिआर में
मैं रंग देता सनम तुझे अपने प्यार में
मैं इतना प्यार देता तुझे जान-ए-आरजू
तू ख़ुद को भूल जाती मेरे ऐतबार में
तू जो कभी बुलाती मुलाक़ात के लिए
बेचैन हो के फिरती मेरे इंतिज़ार में
में देर से जो आता नाराज़ हो के
तुम हर बात का जवाब देती इनकार में
तू जो किसी बात पर मुझ से रूठ जाती
में तुझे मनाता बड़े इसरार में
मान कर तू मुझ से सिर्फ़ यही कहती
है यकीन नहीं कमी कोई तेरे प्यार में..

Friday, April 11, 2008

अब न आऊँगा..

अब न आऊँगा, न आऊँगा, न आऊँगा।
भूल कर भी तेरी महफिल मे न आऊँगा।
दिल न मानेगा तो कुछ दूर चला जाऊँगा।
तेरी यादों का जोपैका है वो निकल जायेगा।
दिल मेरा चाँद सितारे से बहल जायेगा।
मैंने गुलरंग लबो से तेरे कभी पी ही नहीं थी।
सोच लूंगा मोहब्बत मैंने कभी की ही नहीं थी।
अपने जलते हुए होठो को कहीं रख लूंगा।
किसी चट्टान के सीने पर जबी रख लूंगा।
आरजुएँ जो उठेंगी तो दबा लूंगा उन्हें।
अश्क आएँगे भी तो दामन से छुपा लूंगा उन्हें।
अपनी आहें न अब सुनाऊँगा कभी।
अपने आंसू न अब दिखाऊँगा कभी।
अब न आऊँगा, न आऊँगा, न आऊँगा।
भूल कर भी तेरी महफिल मे न आऊँगा।

मैं बेवफ़ाई पे नही लिखता..

उनको ये शिकायत है.. मैं बेवफ़ाई पे नही लिखता,

और मैं सोचता हूँ कि मैं उनकी रुसवाई पे नही लिखता.

''ख़ुद अपने से ज़्यादा बुरा, ज़माने में कौन है ??

मैं इसलिए औरों की.. बुराई पे नही लिखता.

''कुछ तो आदत से मज़बूर हैं और कुछ फ़ितरतों की पसंद है ,

ज़ख़्म कितने भी गहरे हों?? मैं उनकी दुहाई पे नही लिखता.'

'दुनिया का क्या है हर हाल में, इल्ज़ाम लगाती है,

वरना क्या बात?? कि मैं कुछ अपनी.. सफ़ाई पे नही लिखता.

''शान-ए-अमीरी पे करू कुछ अर्ज़.. मगर एक रुकावट है,

मेरे उसूल, मैं गुनाहों की.. कमाई पे नही लिखता.

''उसकी ताक़त का नशा.. "मंत्र और कलमे" में बराबर है !!

मेरे दोस्तों!! मैं मज़हब की, लड़ाई पे नही लिखता.

''समंदर को परखने का मेरा, नज़रिया ही अलग है यारों!!

मिज़ाज़ों पे लिखता हूँ मैं उसकी.. गहराई पे नही लिखता.

''पराए दर्द को , मैं ग़ज़लों में महसूस करता हूँ ,

ये सच है मैं शज़र से फल की, जुदाई पे नही लिखता.

''तजुर्बा तेरी मोहब्बत का'.. ना लिखने की वजह बस ये!!

क़ि 'शायर' इश्क़ में ख़ुद अपनी, तबाही पे नही लिखता...!!!"